नई दिल्ली | पश्चिम एशिया (Middle East) की आग बुझने के बजाय और भड़कती दिख रही है। एक तरफ अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का अल्टीमेटम है, तो दूसरी तरफ ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान की वह ‘भावुक चिट्ठी’ जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया है। क्या यह पत्र वाकई शांति का पैगाम है या युद्ध के बीच ईरान की कोई नई कूटनीतिक चाल?
ट्रंप का ‘दो हफ्ते’ वाला सस्पेंस और इजरायल की आक्रामकता
डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में राष्ट्र के नाम संबोधन में यह साफ कर दिया कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी अभियान रुकने वाला नहीं है। उन्होंने “दो से तीन हफ्ते” का समय मांगकर एक बड़ा सस्पेंस पैदा कर दिया है। ट्रंप के इस बयान के तुरंत बाद ईरान ने इजरायल पर ड्रोन हमले किए, जिसके जवाब में इजरायल ने लेबनान और ईरान में मोर्चा खोल दिया है।
लेकिन इस बार कहानी में ट्विस्ट ट्रंप के दावों से नहीं, बल्कि ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के उस पत्र से आया है, जो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।
पेजेश्कियान की चिट्ठी: अमेरिकी जनता से सीधा संवाद
ईरान, जहाँ कभी ‘डेथ टू अमेरिका’ (अमेरिका की बर्बादी) के नारे गूंजते थे, आज वहां के राष्ट्रपति अमेरिकी नागरिकों को संबोधित कर रहे हैं। पेजेश्कियान ने इस पत्र में तीन मुख्य बिंदुओं पर जोर दिया है:
दुश्मनी जनता से नहीं: उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान की दुश्मनी अमेरिकी जनता से नहीं है। उन्होंने अमेरिकियों से ‘भ्रामक कहानियों’ के बजाय सत्य की खोज करने की अपील की।
ऐतिहासिक रिकॉर्ड: राष्ट्रपति ने याद दिलाया कि ईरान ने आधुनिक इतिहास में कभी किसी युद्ध की शुरुआत नहीं की।
परमाणु समझौता और विश्वासघात: उन्होंने आरोप लगाया कि ईरान ने परमाणु समझौते (JCPOA) का पालन किया, लेकिन अमेरिका ने पीछे हटकर क्षेत्र में अस्थिरता और ‘रणनीतिक भटकाव’ को जन्म दिया।
“ईरान के बुनियादी ढांचे पर हमला करना ताकत का प्रदर्शन नहीं, बल्कि समाधान निकालने में असमर्थता का प्रतीक है।” — मसूद पेजेश्कियान (ईरानी राष्ट्रपति के पत्र का अंश)
क्या यह ‘बैक-चैनल’ कूटनीति का संकेत है?
रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह पत्र सिर्फ एक संदेश नहीं बल्कि एक ‘डिप्लोमैटिक टेस्ट’ है। ईरान देखना चाहता है कि क्या ट्रंप प्रशासन युद्ध के उन्माद से हटकर बातचीत की मेज पर आने को तैयार है।
पेजेश्कियान ने पत्र में उन ईरानी प्रवासियों और वैज्ञानिकों का जिक्र किया जो अमेरिका की टॉप टेक कंपनियों और विश्वविद्यालयों में काम कर रहे हैं, ताकि ईरान की एक सकारात्मक छवि पेश की जा सके।
ट्रंप का ‘ईगो’ बनाम शांति की उम्मीद
सवाल अब भी वही है क्या ट्रंप का ‘अहंकार’ इस सुलहनामे को स्वीकार करेगा? यदि अमेरिका इस पत्र को गंभीरता से लेता है, तो आने वाले दो हफ्तों में बड़ा यू-टर्न देखने को मिल सकता है। लेकिन यदि ट्रंप अपनी आक्रामक नीति पर अड़े रहे, तो मध्य-पूर्व की यह जंग मानवता के लिए एक गहरा जख्म बन सकती है।